Monday, September 10, 2012

बुझती लौ




न जाने क्या बेताबी सी, है आज सीने में,

न जाने क्या हिचकिचाहट सी, है आज जीने में,
न जाने क्या फ़रमाती हैं वो तड़पती चीखें,
जिन्हें सुनती है ख़ामोशियाँ..........सिसकते, सिसकते !

तेज़ है रोशनी
, सच्चाई की,
तेज़ है चुभन, लाचारी की,
तेज़ है उस टूटे शीशे की धार,
जिसने मिटाया हर सपना..........खरोंचते, खरोंचते !

आज कहीं दूर, प्यासा है एक समंदर,
तकते, ओढ़े धरती की ऊष्म चादर,
कि हो मेहरबान वो बादल भी कभी,
जो बरसाए दो ठण्डी बॅूदे..........गरजते, गरजते !

कभी नीम सी कड़वी, कभी चीनी सी मीठी,
न जाने कितनी कहानियाँ, इन कानों ने सुनीं,
जब सुनी न किसी ने , मेरी एक छोटी सी कहानी,
तो रो पड़ा ये मन..........बिलखते, बिलखते !

छींटा है तेज़ाब, तुमने ताज़े ज़ख्मों पर,
चलो फिर भी माफ़ किया, ईश्वर के नाम पर,
बड़ते, सँवरते, फिर झड़ते हर ख्वाहिश को,
सब देखा है इन आँखों ने..........छलकते, छलकते !

जिस्म से बह रहा, हार का खून,
सासों में महक रहा, बीते कल का फूल,
होठों में दबाए इन्ही टूटे अल्फ़ाज़ों को,
सो गया ये दिल..........धड़कते, धड़कते !