Sunday, September 25, 2016

यादों की गुल्लक


शाम की बारिश से ये रात अभी भी गीली है
कुछ गुफ्तगू तो हुई, पर बात अभी अधूरी है

अरसों से अरसे हुए तेरे चेहरे से रूबरू हुए हैं
आँखों को धोते मय को चखने की आरज़ू हुई है

आओ बैठें हम तुम फोड़ें यादों की गुल्लक को
जो भी इकट्ठा हुआ है हिस्सा बाँट कर लें उसको

तुम्हें याद है क्या पिछली सरदी की शाम वो?
कुल्ल्हड़ से चखी थी अदरक की चाय जो

वही कुल्ल्हड़ है अब मेरे हिस्से में
सन गया है जो वक़्त की धूल में

याद है क्या तुम्हें ये चैन वाली घड़ी
तोहफ़े के लिए मेरे पसंद आई थी बड़ी

ये घड़ी है अब तुम्हारे हिस्से की
मर्रम्मत करनी होगी इसके वक़्त की

ये दुपट्टा, ये कंगन, ये सूखा हुआ नसरीन
ये होली वाली हुम्हारी साड़ी, पुती हुई रंगीन

समेंट लो वो सब कुछ जो भी तुम्हारा है
कुछ छूट जाये तो समझ लो वो हमारा है

बस एक नज़्म बाकि रह गया है
पन्नों की लकीरों में दबा है

कहो तो वो भी बाँट लें, आधा तुम आधा मैं
शायद एक गीत बन जाये, जीती तुम हारा मैं

खरोंच लेता हूँ हर एक हर्फ़ नज़्म से
रख लो सरे पन्ने तुम कोरे कोरे से

शाम की बारिश से ये सुबह अभी तक गीली है
कुछ गुफ्तगू तो हुई, पर बात अभी अधूरी है

 

2 comments:

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